Saturday, February 12, 2011

Lakshya sabka ek hi hai

राधे-राधे ,
                         आप लोगों से काफी दिन दूर रही उसके लिए माफ़ी चाहती हूँ, आगे कोशिश ये ही रहेगी मेरी की आप लोगों से निरंतर  जुडी रहूँ,  तो क्या अब हम आगे कुछ और अपने विचार शेयर करें?
                          जैसा की मैं आप लोगों से पहले भी कई बार कह चुकी हूँ कि हमारे मन में अगर भगवान  की जरा सी भी चाहत होती है तो वो हमे सौ गुना अपना प्यार उड़ेलने को तैयार होते हैं, मगर इसका ये मतलब कतई नहीं है की जो उन्हें याद नहीं करते उनसे भगवान् प्यार नहीं करते या उनपर वे कृपा नहीं करते,  वो तो हर प्राणी मात्र पर, जो की उनकी रचित श्रृष्टि का अंग हैं, हर एक से बराबर, एक माँ की तरह प्यार करते हैं, बस इस बात को हमे  समझने भर की देरी है, और फिर देखिये हम कभी उन्हें भूल नहीं सकेंगे और ना ही फिर हमे उनसे अच्छा कोई लग पायेगा. फिर तो बस हमारी पूरी दुनिया ही हमे उनके इर्द-गिर्द नज़र आएगी जो की एक परम सत्य है. मगर वो क्षण हमारे जीवन में आएगा कब? अब ये तो वो ही जानते हैं मगर हमे तो प्रयासरत  रहना चाहिए न , क्योंकि अगर हम झूठे को भी एक कदम उनकी ओर बढ़ाते हैं तो वो १००० कदम दौड कर आने को तैयार हैं, तो कह सकते हैं कि राह चाहे कोई भी क्यों न हो, मगर उसका लक्ष्य परमात्मा तक पहुँचाना ही होना चाहिए, क्योंकि ये ही हमारे जीवन का सार है, बस हमे तो थोड़ी सी कोशिश करनी है बाकी तो  प्रभु खुद ही मार्ग को सुलभ बनाते चले जायेंगे, इस बात का मुझे पूरा विश्वास है.......

               चलिए इसी बात से सम्बंधित एक अनुभव मैं आप लोगों को बताऊँ, जो की मेरी पुत्तापर्थी की यात्रा से सम्बंधित है, मैं अपनी बहन के पास हैदराबाद गयी थी और मेरी वहां जाने की सबसे बड़ी वजह ही पुत्तापर्थी जाकर श्री सत्य साईं बाबा  के दर्शन करना थी, दीदी से बात की और हमने तुरंत ही जाने के लिए प्लान बना लिया और फिर नेट से सारी informations सर्च की तो जिन ट्रेन्स के रूट देखे उनमे सारी ट्रेन्स पेनुकोंदा जो की प्रशांति निलियम से १८ km की दूरी पर है वहां ही रूकती थीं हमने भी प्लान वहां तक जाने का बनाया और सोचा वहां से टेक्सी से निलियम तक चले जायेंगे बस फिर जाने की  तय्यारी शुरू की, tickets बुक हो गए और हमने अपनी यात्रा ट्रेन से रात को प्रारंभ की और सुबह ७ बजे थोड़ी लोगों में हलचल सी देखि, तो पाया धर्मावरम स्टेशन निकला था और तभी TC हमारे कम्पार्टमेंट में आकर बैठ gaya, और बस साईबाबा की कृपा का अनुभव हमे ऐसे कुछ हुआ, कि  दीदी ने ऐसे ही TC से पूछ लिया की क्या ये ट्रेन प्रशांति निलियम नहीं जाती? तो उसने जवाब दिया की ट्रेन अब बस वहीँ रुकने वाली है, वो ही स्टेशन आरहा है और सिर्फ २ mt  का स्तोपेज  है अब लोगों की हालचल का कारण हमारे भी समझ आगया था और हमने जल्दी से अपना सामन उठाया और लोगों के साथ-साथ  हम भी प्रशांति निलियम स्टेशन पर उतर चुके थे, क्या आनंदायी क्षण था वो हमारे तो वहां उतारते ही होंठों पे अनायास ही एक मुस्कराहट आगई थी और जब सामने बाबा की उस विशाल स्वागत करती हुई तस्वीर पर नज़रें पड़ी तो ख़ुशी का ठिकाना न रहा क्योंकि वह ऐसा लग रहा था मानो बाबा कह रहे थे की "और देखा बुला लिया ना बिना परेशानी के तुम दोनों को,?"  हमने बाबा को मन ही मन प्रणाम किया, अब क्या बताऊँ,क्या अनुभूति थी  वो, कहते हैं न कि जहाँ भगवान् वास करते हैं वो जगह स्वर्ग हो जाती है, उस जगह की हर चीज़ मनो हर वक़्त रोमांचित रहती है और ऐसा कुछ वहां भी दिखाई दिया, इतनी सुहानी हवा इतना सुहाना मौसम पेड़ पौधे ऐसे हिल रहे थे मानो ख़ुशी से नृत्य कर रहे हों, सम्पूर्ण वातावरण बहुत ही मनमोहक था प्रकृति जैसे अपने प्रभु का साथ पा कर मनो ख़ुशी से इठला रही थी, और सफाई की जहाँ तक बात करें तो स्टेशन जो की भारत मुश्किल से ही खोजने पर मिलेंगे जहाँ गन्दगी ना हो, मगर यहाँ की तो बात ही और थी एक तिनका भी कहीं नहीं ढूंढ पा रहे थे, न ही पान की पीकें ही कही पड़ी हुई दिखीं, हम स्टेशन से बाहर आये तो ऑटो मिल गया निलियम तक के लिए, बस अब तो असली गोलोकधाम में प्रवेश करने जारहे थे हम, तो आप समझ ही सकते हैं न की मार्ग कैसा रहा होगा, वैसा ही साफ़ चौड़ी सपाट चमचमाती सड़क हरियाली ही हरियाली, छोटी-२ पहाड़ियां, कुछ दूर चलते ही पुत्तापर्थी की भव्यता का एहसास होने लगा क्योंकि वहां बाबा ने भव्य अस्पताल(गरीब असहाय,लाइलाज बीमारियों से पीड़ितों के लिए), संगीत महाविद्यालय, स्कूल, कॉलेज आदि का निर्माण करवाया है और उनके ही संरक्षण में हर उस विद्यार्थी,को चाहे वो किसी भी मजहब का क्यों न हो चाहे वो अमीर हो या गरीब, सब को सामान रूप से बाबा उच्चतम शिक्षा भारतीय संस्कारों के साथ वहां प्रदान करवाते हैं, मैं आप लोगों को उतना बता पाने की समरथ्य  नहीं रखती की मैं बाबा के बारे में कुछ भी ठीक से लिख पाऊँ मगर मन है की अपना अनुभव जितना भी हो सके आप तक पहुँचाने कि कुछ तो कोशिश करूँ, बस इतना ही कह सकती हूँ की इस समय मैं लिखते-२ अपने अतीत में पहुँच गयी हूँ, खैर चलिए आगे बढ़ते हैं एक सुखद सफ़र के बाद आखिर हम अब प्रशांति निलियम (बाबा का निवास स्थान(आश्रम)) के गेट के सामने पहुँच गए, अभी सुबह के पौने आठं बजे थे और तभी देखा एक लम्बी क़तर लोगों की लगी थी जिसमे अचानक हलचल हो रही थी मगर हमने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और निलियम के गेट के सामने वाले होटल में एक कमरा रुकने के लिए पूछने लगे और भाग्य से एक मिल भी गया, अब हमने सोचा चलो स्नान आदि से निवृत्त हो कर बाबा के दर्शनो को जायेंगे मगर तभी होटल के मेनेजर ने कहा जाइए बाबा आगये हैं दर्शन कर लीजिये हमने कहा अभी तो सफ़र से आये हैं ऐसे कैसे जाएँ, मगर उन्होंने कहा आप का भाग्य अच्छा है की बाबा दर्शनो के लिए आगये हैं जल्दी जाइए, अब तो हमने अपना सामान काउंटर पे ही छोड़ा और भाग लिए अंदर कि तरफ जाने के लिए, पहले सिक्यूरिटी चेक्किंग होती है तभी जाने को मिलता है उसमे थोडा समय लगा मगर हम फिर जब तक साधना हाल तक पहुँच गेट बंद हो गया अब हम दूसरे गेट के पास पहुंचे जहाँ पर एक कारसेवक लोगों को अन्दर जाने से रोक रहा था, मैंने देखा वो खुद भी उनके दर्शनो में लगा हुआ था मैंने उससे कहा की हमे भी दर्शन करने दे तो उसने जगह बना दी अब बाबा साफ़ दिख रहे थे, हम तो रोमांचित थे आँखों से आंसू अनायास ही निकले जारहे थे, क्या एहसास था वो बता नहीं सकती बस अनुभव ही कर सकती हूँ, बाबा के पहले दर्शनो का, हमने वहीँ खड़े हो कर बाबा की आरती का लाभ लिया और बस बाबा वापस चले गए, हमने उस कार्यकर्ता को धन्यवाद दिया तो वो पूछने लगा की हम क्या आज ही आये हैं हमने कहा हैं अभी ही पहुंचे हैं, तो वो बोला आपलोग तो बहुत भाग्यशाली हैं जो आते ही बाबा के दर्शन मिल गए मैं तो यहाँ तीन दिनों से दर्शनो को खड़ा हूँ तब कहीं जाकर आज बाबा आये हैं, अब तो हमे होटल के मेनेजर के प्रति भी कृतज्ञता महसूस होने लगी.............और हमने होटल लौट उसे भी धन्यवाद दिया, और बाबा का अगला दर्शन समय पूछा तो वो बोला भाग्य अच्छा रहा तो बाबा जरूर दर्शन देंगे. -------------------

आगे का वृत्तान्त कल ..............................

Friday, December 31, 2010

new year wishesh

राधे-राधे,

आप सभी को नए साल कि बहुत-२ शुभकामनाएं, भगवान आप सभी की सारी मनोकामनाएं पूरी करें ऐसी ही प्रभु से कामना है. बहुत जल्दी फिर लौटूंगी कुछ और interesting  अनुभवों के साथ, जय श्री राधे, जय श्री कृष्ण, जय गुरुदेव.

राधे-राधे

Tuesday, December 28, 2010

haan wo sai baba hi the...............




राधे-राधे,

हमारे जीवन में भगवान कई बार साक्षात् सामने आ खड़े होते हैं मगर हम जैसे इस संसारिकता का चश्मा लगाये लोगों को उन्हें पहचान पाना मुश्किल ही होता है, और जब समझ आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, ऐसा ही एक अनुभव मुझे कुछ समय पहले हुआ था, मैं साईबाबा का गुरुवार का व्रत किया करती थी और उस गुरुवार को उद्द्यापन करना था, मैंने भोग तैयार किया और और सोचा जा कर साईं बाबा के मंदिर में भोग पहुंचा आऊँ, और बस पास ही बिल्डिंग के पीछे एक छोया सा साईं बाबा का मंदिर था वहीँ दर्शन के लिए चली गयी, कोई भी वहां दिखाई नहीं दिया, ऐसे ही छोटा सा गेट था जो lock  नहीं था मगर बंद था, मैंने इधर-उधर देखा मगर कोई भी दिखाई नहीं दिया, मैं गेट खोल के अन्दर गयी और बाबा को प्रणाम किया, तथा भोग उनके चरणों में रख दिया और उनसे कहा " साईं बाबा खा लेना, जरूर"  और मैं निकल के बाहर आगई, गेट को पहले जैसा बंद करने लगी, तभी एक यवन (मुस्लिम वेश धारी) ने मुझसे पीछे से आकर कहा "अरे खुला रहने दो मैं अन्दर जाऊंगा", मैंने उन्हें देखा तो वो मुस्कुराते हुए खड़े थे, मुझे थोडा उनका इस तरह से मुस्कुराना अटपटा लगा,  मैंने उनसे पूछा "आप बाद में बंद करके जायेंगे ना? ", उन्होंने हाँ कहा और मैं वापस आने लगी, मगर देखिये मेरे मन में एक बुरी बात आयी कि अरे ये तो कैसे गंदे कपडे पहने हैं कितनी अजीब वेशभूषा है इस आदमी कि, कहीं ये न उठा ले जाये भोग, और इतना सोचते-२ ही अचानक याद आया कि साईं सद्चरित्र में हमेशा ही ये  लिखा होता है कि बाबा यवन रूप में आये, कहीं ये बाबा ही तो नहीं हैं? अब मुझे अपनी गलती का तुरंत ही एहसास हो गया था मैंने पलट कर मंदिर के अन्दर देखा मगर वहां मुझे कोई भी फिर दिखाई नहीं दिया, मुझे बुरा लगने लगा था क्योंकि समझ आगया था कि हाँ वो बाबा ही थे,अब तो  उस चहरे पे फैली वो मुस्कराहट याद आने लगी और तब से लेकर आज तक वो पल मेरे आँखों के आगे वैसे के वैसे घुमते रहते हैं, मुझे वो चेहरा वो आवाज जो कि बहुत ही सोफ्ट थी आज भी याद है,  मै थोड़े गिल्ट थोड़ी  ख़ुशी के साथ घर आयी और माँ को बताया सब कुछ, तो माँ ने कहा " चल तेरा भोग तो उन्होंने खुद आकर ग्रहण कर लिया न और जहाँ तक उन्हें पहचानने कि बात है, तो देर से ही सही पहचान तो लिया ना तूने उन्हें , उनके साक्षात् दर्शन हो गए और क्या चाहिए." ,हाँ, माँ कि ये बात सुन कर मुझे थोडा सुकून मिला, और इस बात कि तसल्ली हुई कि बाबा ने मुझे साक्षात् दर्शन दिए.

आज के लिए इतना ही काफी है, बहुत जल्दी और भी अनुभव आप लोगों के संग बाँटना चाहूंगी तब तक के लिए आज्ञा दीजिये, जय श्री राधे, जय श्री कृष्ण, जय गुरुदेव, ॐ श्री साईं नाथाय नमः:|

Sunday, December 26, 2010

sai baba ke kuchh aur anubhav

राधे-राधे,

आप सभी को क्रिसमस कि बहुत-२ शुभकामनाएं, आज समय मिलते ही पिछले प्रसंग को आगे बड़ा रही हूँ इस देरी के लिए क्षमा चाहती हूँ मगर कुछ व्यस्तता के कारण नहीं लिख पाती हूँ रेगुलरली, मगर देर से ही सही लिखूंगी जरूर और न सिर्फ अपने बल्कि दूसरों के अनुभव भी लिखना चाहूंगी क्योंकि मेरा लक्ष्य आप सब को भगवान् कि कृपा जो हर वक़्त हर इंसान या कह सकते हैं कि हर प्राणी पर होती रहती है, उससे अवगत करना है  ताकि आप सब का जो विश्वास परमात्मा पर है वो और प्रगाढ़ हो और आप सब को प्रभु कि हर क्षण अपने साथ उपस्थिति का भान  होता रहे, यही मेरा उद्देश्य है..

साईं बाबा से जुड़े कुछ और अनुभव :

जैसा मैंने बताया था कि मेरी शिर्डी कि वो यात्रा कितनी रोचक थी, हमारा विश्वास साईबाबा पर और दृढ़ हो गया था, कुछ समय बाद ही इसका एक और अनुभव मुझे हुआ जो मैं यहाँ आप लोगों के साथ शेयर कर रही हूँ, मुंबई में जून का महिना तेज वर्षा हो रही थी उसी समय घर पर फ़ोन आया कि बरोदा  से मेरी एक रिश्तेदार अपनी बेटी के साथ आरही  हैं, वो लोग देर रात मुंबई पहुँचाने वाले थे मगर पता चला कि बारिश कि वजह से ट्रेन वापी (गुजेरत) में ही रोक दी गयी है, अब क्या किया जाए ? रात में ही ये निश्चित   किया गया कि मैं और मेरा कसिन उनको लेने वापी जायेंगे, प्रोग्राम फिक्स हो गया, हम दोनों सुबह चार बजे ड्राईवर के साथ वापी के लिए रवाना हुए, उस समय बारिश नहीं हो रही थी मौसम ठीक ही था, हम लोगों ने सोचा कि २-३ घंटे में वहां पहुँच कर उन्हें ले कर १ बजे तक घर लौट आयेंगे, मुंबई से बाहर निकल गए थे करीब २०-२५ किलोमीटर गए होंगे कि रास्ते में सड़क के लेफ्ट साइड में जाम लगा देखा सिर्फ मुबई आने वाला रास्ता चालू था दूसरी तरफ जाम था, लाइन से ट्रक खड़े थे गिनती करना मुश्किल थी, पता नहीं ड्राईवर से कैसे गलती हो गयी उसने गाड़ी उस क़तर के पीछ से ले कर उनके भी लेफ्ट में लगा दी अब तो हमारी देखा देखि और गाड़ियाँ भी पीछ आगईं और जाम हो गया एक और लाइन का. ड्राईवर घबरा गया और घबराहट में ही आगे बढ़ाता चला गया आगे एक जगह मिटटी गीली होने से पानी के साथ किनारे से बह गयी थी और रास्ता पूरी तरह जाम हो गया था, अब क्या करें? इंतज़ार ही कर सकते थे, और कोई चारा नहीं था, अब बारिश भी तेज हो गयी गाड़ी में बैठे -२ एक घंटा हो गया मगर स्थिति ज्यों कि त्यों बनी हुई थी, एक घंटा और निकला अब थोड़ी भूक भी लगने लगी थी मगर हमारे पास एक बोटेल पानी के अलावा और कुछ नहीं था कह सकते हैं कि ये हमारी भूल का नतीजा था, अब बारिश थोडा कम हुई तो ड्राईवर और भाई गाड़ी में मुझे lock कर के बाहर का जायजा लेने निकले कुछ ट्रक drivers से पूछ उन्होंने तो पता चला कि वो तो इस इस्थिति में पिछले ७ दिनों से पड़े हैं एक ही जगह अब तो हम लोगों के हाथ पैर ठन्डे होने लगे, कोई भी चारा नहीं था उस जगह बैठे रहने के अलावा, उस एक ही जगह बैठे-२ हमे ५-६ घंटे हो गए थे, उन दोनों को दर लगने लगा था क्योंकि मै उनलोगों के साथ थी और वहां हर तरफ सिर्फ ट्रक ही ट्रक दिख रहे थे मगर पता नहीं मुझे तब भी वो दर नहीं था बस ये ही लग रहा था कि बाबा कुछ रास्ता जरूर निकालेंगे, अब ये दोनों एक बार फिर थोडा आगे तक देखने गए कि कहीं कुछ रास्ता दिखे शायद, इधर मैंने आँखें बंद कर साईं बाबा को याद किया और उनसे प्रार्थना कि कि साईं बाबा अगर आप यहाँ इस समय मौजूद हैं तो हमे यहाँ से निकालिए कैसे भी, मै ध्यान कर ही रही थी कि किसी कि आवाज सुनायी दी कि अगर किसी को मुंबई वापस जाना है तो जल्दी से यहाँ से निकाल लो गाड़ी निकलने कि जगह है यहाँ पर और जब मैंने ये सुन आँखे खोलीं तो देखा कि सारे ट्रक जो जाने कब से फंसे हुए थे चलने शुरू हो गए थे, तभी ड्राईवर और कसिन भी दौड़ के आये और जो रास्ता साईबाबा ने हमारे लिए बना दिया था उस रास्ते से आसानी से बाहर निकल आये थे और अब मुंबई वापस आने के खुले रास्ते में थे, अब तो मैंने साईबाबा को बहुत बहुत धन्यवाद् दिया और जैसे तैसे घर पहुंचे, अब आप ही बताइए क्या ये साईबाबा कि कृपा नहीं है? मेरा तो भगवान कि उस हर वक़्त बरसने वाली कृपा पर पूर्ण विश्वास है और आप लोगों कि क्या राय है बताइए. मुझे पूरा विश्वास है कि भगवान् हमेशा हम सब के साथ रहते हैं बस हम ही उन्हें पहचान नहीं पाते, क्योंकि वो तो किसी भी रूप में हमारे साथ हो सकते हैं क्योंकि वो तो सर्वव्यापी हैं, बस उनकी कृपा का एहसास इसी तरह होता रहे उनकी भक्ति मन में हमेशा बनी रहे वो कभी भी हमारे ध्यान से दूर न जायें ये ही उनसे प्रार्थना है, आप सब को भी प्रभु का साथ हमेशा अनुभव होता रहे इसी कामना के साथ जय श्री राधे, जय श्री कृष्ण, जय गुरुदेव, ॐ श्री  साईं नाथाय नमः.

Sunday, December 19, 2010

Param pujya shree shirdi sai baba ki anubhutiyaan.........

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राधे-राधे,

आप सभी से काफी दिन दूर रही उसके लिए माफ़ी चाहती हूँ, मगर पता है आप लोग मुझे माफ़ करेंगे, इसलिए धन्यवाद के साथ कुछ नए अनुभवों को बाँट रही आप सभी के साथ....

           जैसा की मै पहले ही आप लोगों से कह चुकी हूँ की जब व्यक्ति को प्रभु की कृपा से उसके अद्ध्यात्मिक गुरु का सानिध्य प्राप्त हो जाता है तब उनकी कृपा से उन अभूतपूर्व पूज्य आत्माओं का दर्शन व अनुभूतियाँ भी शिष्य को होनी शुरू हो जाती हैं, या ये कह सकते हैं की जो कृपा वे आजतक करते आरहे थे उनकी समझ और पहचान धीरे-२ होने लग जाती है, ऐसा ही कुछ शायद मेरे साथ भी थोडा-२ होने लगा है मुझे भी शायद अब भगवान व संत महापुरुषों की कृपा का कुछ-२ एहसास होने लगा है, कुछ अनुभूतियाँ मुझे हुई हैं जिन्हें बताना चाहूंगी, इसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कुछ अनुभव  मै प.पु. श्री शिर्डी साईं बाबा के बारे में प्रेषित कर रही हूँ  ,
            बात उस समय  की है जब मै दिल्ली में छात्रावास में रहती थी और दीवाली पर घर आयी थी तब घर पे एक कैलेंडर देखा जिसमे श्री शिर्डी साईबाबा अपने चिरपरिचित मुद्रा में आशीर्वाद दे रहे थे, मैंने माँ से पूछा ये कब आये, तो माँ ने बताया "देखो इनका चमत्कार की एक दिन हम सोच रहे थे की हमारे घर में साईं बाबा की एक भी फोटो नहीं है एक लेकर आयेंगे, और उसी दिन शाम जब हम अपने एक परिचित के घर गए तो उन्होंने हमे ये कैलेंडर दिया ये कहते हुए कि वे शिर्डी गए थे तो वहां से लाये हैं हमारे लिए भी" , और देखिये बाबा ने इस तरह माँ की इच्छा तुरंत ही पूरी कर दी और घर में साक्षात् पधार गए, ये बात मैंने सुनी और जब  मै हॉस्टल लौटी तो अपनी रूम मेट को ये बात बताई वो भी तमिल ब्रह्मिन थी व भगवान् में उसका भी पूर्ण विश्वास था, हमने अपने कमरे में एक छोटा सा पूजा स्थान बना रखा था, जब हम ये बात कर रहे थे तभी हमे भी लगा की हमारे पास भी साईं बाबा की एक भी फोटो नहीं है और हमने सोचा की अब जिस दिन छुट्टी होगी हम उस दिन बाज़ार से ले कर आयेंगे, अगले दिन सुबह-२ मैं स्नान कर पूजा करने बैठी ही थी की अनौंसमेंट  हुआ मेरे नाम का की कोई मिलने आया है, मैं नीचे गयी तो मेरी एक फ्रेंड जो पूना में रहती थी उसने मेरे लिए कुछ तोहफे भेजे थे, मैं उन्हें ले कर ऊपर आयी और हम खोल कर देखने लगे और जैसे ही मैंने पहला पक्केट खोला साईं बाबा उसी अपनी चिरपरिचित मुद्रा में मुस्कुराते हुए आगये, उन्हें देखते ही हम दोनों अपनी हंसी रोक नहीं पाए और उस ख़ुशी में कब हमारे आंसू बहाने लगे पता ही नहीं चला और देखिये तो साईं बाबा भी हमारे साथ-२ वैसे  ही मुस्कुरा रहे थे, हमारी तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी थी हम दोनों बहुत खुश थे और हमने फिर मिलकर उन्हें अपने पूजा के स्थान पर पूर्ण श्रद्धा के साथ विराजमान किया, और तब से उनकी सर्वव्यापकता का हम लोगों को एहसास होने लग गया था, क्योंकि हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ हर चीज को मानने के लिए साक्ष्य की जरूरत पड़ती है शायद इसी वजह से भगवान् को भी अपनी उपस्थिति का एहसास हम कलयुगी लोगों को कराने  के लिए समय-२ पर प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ता है, खैर जो भी है भगवान् को थोडा दिक्कत तो जरूर होती है मगर कम पर कुछ तो असर होता ही है ऐसा मेरा सोचना है.

      इसी कड़ी में आगे --८-९ वर्ष पहले की बात होगी मेरा बहुत शिर्डी जाने का मन था मैंने माँ से कहा और कुछ ऐसा चमत्कार हुआ की हमारा अगले ही दिन सुबह जाने का प्रोग्राम बन गया हमारी पहली शिर्डी यात्रा का, रात को ही ड्राईवर को सुबह पौने चार बजे बुला लिया और मै, माँ, पास में ही रहने वाली एक आंटी व उनकी बेटी हम पांच लोगों ने मुंबई से शिर्डी के लिए प्रस्थान किया, मौसम भी बारिश का होने पर भी साफ़ मिला जब नासिक पहुंचे तब से रिमझिम फुहारे पदनी शुरू हो गयी कहते हैं की वहां ऐसा ही मौसम लगभग पूरे वर्ष रहता है, बहुत ही अच्छा मौसम था, हम करीब एक बजे तक शिर्डी पहुँच गए तभी याद आया की आज तो मंगलवार है, और आज के दिन तो इतनी भीड़ होती है की बाबा के दर्शनों को सुबह से शाम तक खड़े रहना पड़ जाता है तब कहीं दर्शन मिल पाते  हैं और हमे तो उसी दिन वापस लौटना था, खैर अब तो बाबा पे छोड़ दिया था, और उनके दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया, अब देखिये बाबा की लीला, जिस समय हम मंदिर में गए उस समय मुश्किल से १०-१२ लोग ही बस वहां दर्शनों के लिए लाइन में लगे थे और बाबा अपने भगतों को मुस्कुराते हुए स्वागत कर रहे थे बाहर भी (टीवी पटल पर भी), मैं यहाँ इस बात पर आप लोगों का ध्यान  आकर्षित करवाना भी जरूरी समझती हूँ की जब आप लाइन में लगे होते हैं तब बाबा का लाइव वीडियो वहां टीवी स्क्रीन्स पर दर्शनों हेतु मौजूद रहता है और बाबा को देख कर आपको एक परम आनंद प्राप्त होता है क्योंकि वो इस तरह उनके चरणों के दर्शन करने पहुंचे भक्त को देख रहे होते हैं मानो पूछ रहे हों की और कैसे हो कुछ चाहते हो तो बताओ. एक माहौल ही बाबा के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक हो जाने का बन जाता है (किसी के लिए भी) वहां, हमे भी जाते ही बाबा ने चमत्कार दिखा दिया था, अब हम बाबा के सामने खड़े थे और बिना किसी असुविधा के आराम से बाबा के भरपूर दर्शन कर पा रहे थे वो भी मंगलवार के रोज हमने वहां बाबा को पूरे १५ मिनट निहारा, और बस फिर तो देखा की वाहाँ भारी   भीड़ हो गयी,हमने एक बार फिर बाबा को प्रणाम किया और धनंयवाद दिया की उन्होंने हमे उनके  दर्शन करने की इच्छा को पूर्ण कराया. हम मंदिर से बाहर आये शनि देवजी के व गणपतिजी के भी दर्शन किये व मंदिर से बाहर आकर कुछ खरीद दारी  की व लंच आदि के बाद मुंबई के लिए साईं बाबा से आज्ञा ले शिर्डी से प्रस्थान किया, अब नासिक पहुँचने से पहले पड़ने वाली पहाड़ी क्षेत्र में पहुंचाते ही लम्बा जाम लग गया पता चला एक बड़ा ट्रक आड़ा खड़ा हो गया है और अब शायद पूरी रात यहीं रुकना पड़ जाएगा, इस समय शाम के सात बज चुके थे अब तक पीछे भी कई और गाड़ियों के कारण जाम लग गया था हम पैक हो चुके थे, एक तरफ ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी खाई, मगर मन में तो बाबा बसे थे बाबा के उपर पूर्ण विश्वास था इस लिए डर  नहीं लग रहा था जबकि हम चार महिलाएं और एक ड्राईवर ही बस थे मगर उन सब से ऊपर बाबा का साथ था और गुरूजी तो रहते ही हैं न साथ हमेशा तो, हम बस बाबा को कह रहे थे की निकाल दो यहाँ से ताकि हम आज ही घर पहुँच सकें और तभी थोड़ी देर में वो ट्रक सीधा हो गया जो असंभव था, मगर सब बाबा की कृपा थी वो चाहें तो क्या नहीं कर सकते, बस थोड़ी देर में ही जाम ख़तम हो गया और हम नासिक पहुँच गए और फिर लगभग १० बजे रात तक हम बाबा की कृपा से घर पहुँच चुके थे, एक अविस्मरनीय उत्साह के साथ. ये सब बाबा के उस आशीर्वाद का फल था, और ये अनुभूति भी हमे पु.गुरूजी की कृपा से ही हुई थी, जो हम साईं बाबा की उपस्थिति का एहसास कर पाए, क्योंकि कहते हैं न की गुरु की अगर कृपा होती है तो भगवान् सानिध्य भी प्राप्त हो जाता है.

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आज के लिए इतना ही काफी है, कल इसी प्रसंग ka  आगे भी विस्तार  करूंगी, आज आज्ञा दीजिये, जय श्री राधे, जय श्री कृष्ण, जय गुरुदेव, ॐ श्री साईं नाथाय नमः |



Friday, December 10, 2010

Guru purnima ke samay ka anubhav.......

राधे-राधे,
आज मुझे कुछ और याद आया,प.पु गुरूजी के बारे में बताने के लिए, ये बात एक समय गुरु पूर्णिमा महोत्सव की है, मै गुरु पूर्णिमा के लिए पहले ही जबलपुर पहुँच गयी थी, उत्सव से एक दिन पहले हम सब सत्संग के लिए आश्रम में बैठे थे की गुरूजी ने मुझे अचानक अन्दर बुलाया और मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और कहा तेरी  तबियत ठीक है न? तो मैंने कहा जी गुरूजी बस थोडा कोल्ड है और कुछ नहीं, मगर उन्होंने तभी दीदी को बुलाया और कहा की तेरी बहन की तबियत ठीक नहीं है तुम लोग अभी ही घर लौट जाओ, तो दीदी ने कहा की बस गुरूजी सत्संग के बाद निकल जायेंगे, मगर गुरूजी ने तुरंत जाने को कहा, और कहा सम्हाल के ले जाना ये बीमार है, हम लोग वहां से निकल गए तभी हम घर फ़ोन करने के लिए रुके मगर मुझे इतनी देर में तेज ठण्ड लगने लगी और हमे बिना बात किये घर वापस आना पड़ा, 2nd floor तक चदना मुश्किल होने लगा, ऊपर जाते ही मुझे इतनी तेज ठण्ड लगने लगी की दीदी और उनकी फ्रेंड (जो उनके साथ ही रहती थी) ने सारे ओढ़ने  के कपडे मेरे ऊपर  डाल दिए मगर मेरी ठण्ड कम ही नहीं हो रही थी, रात भर दोनों मेरे हाथ पैर मलती रहीं सिकाई कर्रती रहीं मगर कुछ फायदा नहीं हो रहा था, पूरी रात कोई भी नहीं सोया था, सुबह गुरुपूर्णिमा महोत्सव में पहुँचाने की चिंता होने लगी, गुरूजी से हम लोग प्रार्थना कर रहे थे, अब सुबह हुई सब को नींद आगई मुझे भी अब थोड़ी गर्मी आनी शुरू हो गयी थी तो हम सब सो गए, सुबह ७-७:३० पर माँ और एक आंटी आगये, उनकी ट्रेन थोडा देर  से पहुंची थी इस लिए हम भी उनके आने पर ही उठे अब उनके आते ही देखिये भगवान् की लीला, ऐसी तेज बारिश शुरू हो गयी की लगे की अब कैसे आश्रम पहुंचेंगे? खैर फिर ये हुआ की  दीदी ने कहा, मै तो पहले निकल जाती हूँ और कोई टेक्सी वगैरह ले कर आती हूँ तब तक आप लोग सब तैयार हो जाइये हम सब तैयार हो गए मगर तभी दीदी ने आकर बताया की कालोनी से मेन रोड तक जाने के बीच में एक बरसाती नाला पड़ता है जो भर गया है और उसका बहाव इतना तेज था की एक आदमी की bike व वो खुद भी बह गया है, इसका मतलब साफ़ था की अभी निकल पाना मुश्किल था, दीदी और उनकी फ्रेंड दोनों वहीँ खड़े हो कर नाले के उतरने का इंतज़ार कर रहे थे मगर वो तो उफान में ही आता जा रहा था, बारिश भी रुकने का नाम नहीं ले रही थी, पता नहीं गुरूजी क्या परीक्षा ले रहे थे हमारी, तभी दीदी से नहीं रहा गया और उन्होंने अपनी फ्रेंड को घर जाने को कह खुद ने गुरूजी को याद कर नाला पार कर लिया और गीले कपड़ों से ही आश्रम के लिए रवाना हो गयीं, फ्रेंड ने हमे आकर बताया सब, हम क्या कर सकते थे, हम young थे हम तो एक बार को निकल भी जाते मगर उन दोनों को कैसे पार कराते , अब तो बस बारिश रुकने व नाले के उतरने के इंतज़ार के अलावा कुछ नहीं हो सकता था, हम लोग घर में ही बैठ कर गुरूजी से प्रार्थना करने लगे, लगभग दोपहर के दो बज गए थे, बारिश अब रुक गयी थी मगर नाला अभी भी जस का तस बह रहा था, बार -२ हम दोनों जाकर condition देख कर आते मगर, कोई फायदा न होता अब शाम के चार बज चुके थे हम सब उदास थे, मगर फिर भी मन में कहीं न कहीं एक आस थी की पहुँच जायेंगे ही, अब एक घंटा और निकला, अब माँ वगैरह ने भी कहा की चलो भगवान् का नाम ले कर चलते हैं और जैसे ही थोडा नाला उतरेगा हम पार कर निकल जायेंगे, अब चाहे रात ही क्यों न हो जाए दर्शन तो करने ही हैं गुरूजी के, वैसे आश्रम शहर के एक छोर पे है और हमारा घर दूसरे छोर पे वो भी शहर से काफी दूर, खैर अब निश्चय कर हम चारों निकल पड़े, नाला थोडा नीचे आगया था मगर इतना नहीं की कोई पैदल पार कर सके क्योंकि बहाव अभी भी तेज था, एक घंटा और निकल गया, अब कुछ ४व्हीलर्स नाले को पार कर पा रहे थे, हम वहां खड़े-२ बस गुरूजी को कह रहे थे गुरूजी क्या कर रहे हैं ये आप?, अब तो दर्शन दे दीजिये, तभी हमारे पास एक बुजुर्ग आकर खड़े हो गए और पूछने लगे की स्थिति क्या है? हमने कहा बस ४व्हीलेर्स निकल पा रहे हैं और वो भी एक्सपर्ट ड्राईवर ही चला पाएंगे नहीं तो बहाने का खतरा है, अब वो भी हमारे पास खड़े हो गए और बातों-२ में उन्हें हमने बताया की हमे अपने गुरूजी के दर्शन को जाना है मगर देखिये भगवान् हमारी कैसी परीक्षा ले रहे हैं, उन्होंने कहा मगर अब तो कोई टेम्पो टेक्सी कुछ भी नहीं मिलेगी अगर नाला पार कर भी लोगे तो भी, ये तो और चिंता की बात थी मगर फिर हम लोगों ने सोचा कुछ नहीं मिलेगा तो बस जो सिटी जाती हैं उन्ही से चले जायेंगे, ये बातें हम कर ही रहे थे की तभी वो बुजुर्ग हमसे बोले देखिये मेरी जीप है और मुझे सदर तक जाना है अगर आप लोग चाहो तो मै वहां तक छोड़ दूंगा वहां से ऑटो ले लेना, बाकी भगवान की जैसी इच्छा अगर आपके गुरूजी की कृपा रही तो हम सब सही सलामत नाला पार कर लेंगे, हमे तो जैसे भगवान् मिल गए थे उनके रूप में हमने थोड़ी भी देर किये बिना जीप में बैठना स्वीकार किया, अब वो बुजुर्ग बोले, चलो अपने गुरूजी को याद कर जैकारा लगाओ बच्चो, हमने जोर से जैकारा लगाया "जय गुरूजी की, जय श्री कृष्ण" और बस पलक झपकते ही नाला पार हो गए, उन्होंने हमे सादर बाज़ार तक छोड़ा उनको हम सब ने धनंयवाद दिया (हार्दिक), और ऑटो ले कर हम आश्रम पहुँच गए अब रात के ८-८:३० हो गए होंगे, हम दौड़ते हुए गुरूजी के पास पहुंचे, देखा तो गुरूजी बहुत थके हुए लग रहे थे मानो हमारे साथ वो भी आये हों और उस जीप को पार करने में उन्होंने ही हाथ लगाया हो? फिर भी हंस कर बोले और पहुँच गए आखिर, हम लोग तो बस गुरूजी के चरणों में गिर गए, हमे तो जैसे सारा संसार मिल गया था, बस गुरूजी के दर्शन ही करे जा रहे थे मन उनके पास से हटने को नहीं कर रहा था, तभी गुरूजी ने कहा अब तुम लोग घर जाओ, हम भी थक गए हैं अब कल बात करेंगे, मन तो भर नहीं रहा था मगर गुरूजी की आज्ञा थी और हम खुश थे की आखिरकार दर्शन तो मिल ही गए, और क्या चाहिए था, मुश्किल  से आधा घंटे ही हम आश्रम में रुके होगे और वापस घर लौट के आने लगे तो सोचा की अब वापस कैसे जायेंगे, नाला उतरा तो नहीं होगा इतनी जल्दी खैर टेक्सी वाले को कहा अगर नाला नहीं उतरा होगा तो वापस ला कर किसी होटल में छोड़ देना, मगर ये क्या लौटे तो नाला सामान्य अवस्था में था और वहां ऐसा जरा भी नहीं लग रहा था की एक घंटे पहले वो स्थिति रही होगी यहाँ, सब सूखा हुआ था, बस अब तो ये ही कह सकते हैं की गुरूजी ने परीक्षा ली थी, हम कितने सफल हुए, हुए भी या नहीं ये तो गुरूजी ही जाने बस हम तो इस बात से आज तक खुश हैं की गुरूजी ने दर्शन दे दिए ऐसा ही लग रहा था जैसे गुरूजी हम लोगों के आने का ही इंतज़ार कर रहे थे और हमे दर्शन दे कर विश्राम के लिए चले गए, गुरूजी की महिमा  तो गुरूजी ही जाने, हम तो इतना ही जानते हैं की हम तो अपने प.पु. गुरूजी को बहुत प्यार करते हैं, और गुरूजी हम को अपने चरणों में ऐसे ही बिठाये रखें , वो हमेशा हमे अपनी कृपा का पत्र बनाये रखें और कुछ नहीं चाहिए, जय श्री राधे, जय श्री कृष्ण, जय गुरुदेव.

Tuesday, December 7, 2010

PUJYA GURUJI KA HUMARE GHAR AAGMAN..........

राधे-राधे,
जैसा की मैंने पहले आप लोगों को बताया था की कैसे हम लोगों को प.पु गुरूजी ने अद्ध्यात्म के मार्ग में लगाया, उसी समय गुरूजी ने माँ को कहा था की हम तुम्हारे घर आयेंगे, माँ उस समय थोडा सोच में pad, बस माँ के मन में क्षण मात्र के लिए कुछ विचार आया, की गुरूजी समझ गए माँ की मनःस्थिति और तुरंत बोले अब तू एक यज्ञ करवाना तब हम तेरे यहाँ आयेंगे, माँ ने सोचा हम लोग कहाँ यज्ञ करवा सकते  है और वो भी गुरूजी से?, मगर अब गुरूजी का कथन था तो सत्य तो होना ही था तो फिर तो सब किस  तरह होता गया वो तो वो ही जाने, ६ महीनो के अन्दर ही हम लोगों को यज्ञ करवाने का मौका आगया और गुरूजी की कृपा से लोग अपने आप जुड़ते गए गुरूजी के प्रताप से उन्ही के संरक्षण में ५ दिनों तक यज्ञ चला, पूरा वातावरण खुशनुमा हो गया, कहाँ से क्या इंतज़ाम होता गया पता ही नहीं चला, जिस दिन यज्ञ की पूर्णाहुति का दिन था, उसदिन  गुरूजी ने सभी कार्यकर्ताओं को अपने तरफ से त्रोफियाँ प्रदान कीं  व सभी को मुद्रा भी पुरूस्कार स्वरुप प्रदान की जो अभी तक हम सभी ने सुरक्षित रखी हुयी है, पूर्णाहुति वाले दिन सुबह गुरूजी ने कन्या भोज कराया ऐसा लग रहा था जैसे छोटी-२ देवियाँ साक्षात् आसमान से उतर आयीं हैं और सभी भक्त  जनो को आशीर्वाद  प्रदान  कर रही हैं, जब  सुबह भोग  तैयार  हुआ  तो गुरूजी ने गौसेवा करवाने को कहा हम सब सोच ही रहे  थे की गौमाता कहाँ से आएँगी , तभी  एक आश्चर्यजनक बात हुयी, एक काले रंग की सुन्दर सी गौमाता अपने  बछड़े के साथ खुद-ब-खुद आगईं और गुरूजी के पास आकर खड़ी हो गयीं जिन्हें देख कर गुरूजी एकदम खुश हो उठ कर खड़े हो गए और बोले "अरे! ये तो श्यामा हैं, कैसी हो? अच्छा इसे भी लाई ho?" और फिर उन्हें प्यार से हाथ फेरने लगे व खुद अपने हाथों से भोजन कराया ( मैं आप लोगों को इस समय के फोटोग्राफ्स भी उपलब्ध करूंगी मगर थोड़े दिनों बाद), कन्या भोज के बाद अन्य सभी ने भी भोग पाया, गुरूजी विश्राम के लिए चले गए थे २ बजे से फिर यज्ञ की पूजा शुरू होने वाली थी हम सब यज्ञ मंडप के पास ही अपने-अपने कामो में लगे हुए थे, घर पर माँ व कुछ रिश्तेदार थे, तभी अचानक गुरूजी की गाडी हमारे पास से निकली और गुरूजी ने भाई से कहा की चलो रास्ता दिखाओ हम तुम्हारे घर आरहे हैं तभी मैं और भाई जल्दी से गाड़ी में बैठ गए और थोडा लम्बे रास्ते से उनको ले कर गए जब तक दीदी पास वाले रास्ते से घर पहुँच गयीं और जाकर सबको खबर कर दी और जल्दी-२ उनके स्वागत का जो भी बन पड़ा इन्तेजाम किया गया, माँ को तो सब कुछ अविश्वसनीय लग रहा था, गुरूजी आये पूरे घर में घूमे और आकर हॉल में आसन पर बैठ गए तब तक आस-पास के लोग भी उन्हें देख कर आगये थे और, हॉल लोगों से पूरा खचाखच भर गया था, गुरूजी ने सब से बातें की और कुछ लोगों की समस्याओं का निवारण भी किया, शायद १ घंटा गुरूजी घर में रहे फिर सबसे कहने लगे चलो हवन का समय हो रहा है और उठ कर गाड़ी में बैठ के चले गए, माँ तो कुछ भी बोल ही नहीं पा रही थीं न ही उन्हें कुछ समझ आरहा था बस यही कहती जा रही थीं की हम गुरूजी की सेवा ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, मगर जाते समय गुरूजी बोले तेरा सब ठीक है, और चले गए अपना वचन पूरा कर के जो उन्होंने माँ को कुछ समय पहले दिया था.
              हम सब भी यज्ञ स्थल पहुँच गए थे हवन शुरू हो गया, शाम को यज्ञ की पूर्णाहुति थी अभी तक तो गुरूजी एक बार भी यज्ञ मंडप के अन्दर नहीं गए थे, बस दूर ही बैठे देखते रहते थे, शाम को पूर्णाहुति के समय गुरूजी यज्ञ मंडप के अन्दर पहुंचे और जैसे ही गुरूजी ने आहुति दी की अग्नि देवता जैसे अपने उत्साह को रोक न पाए हों और यज्ञवेदी से लपटें मंडप की छत तक पहुँचाने लगीं बस गुरूजी तुरंत ही वापस लौट गए गुरूजी का पूरा मुखमंडल लाल हो गया था, और गुरूजी गाड़ी में बैठ कर विश्राम स्थल रवाना हो गए थे, सब ने देखा गुरूजी के जाते ही लपटें वापस अपने स्वाभाविक स्वरुप में आगईं थी लोग जैजैकार कर रहे थे इस प्रकार यहाँ गुरूजी का यज्ञ निर्विघ्न गुरूजी की व बाँके बिहारी की कृपा से पूर्ण हुआ व सभी आरती के बाद गुरूजी के दर्शनों को प्रस्थान करने लगे. इस तरह गुरूजी ने माँ को दिए अपने दोनों वचनों को पूर्ण कर दिया. प.पु.गुरुगी के चरणों में शत-शत प्रणाम, गुरूजी हम आपको बहुत याद करते हैं| जय श्री राधे, जय श्री कृष्ण, जय गुरुदेव. भगवान की कृपा सब पर बनी रहे इसी कामना के साथ आज यहीं विश्राम लेती हूँ जय गुरुदेव.